गाजियाबाद के पूर्व महापौर आशु वर्मा ने इस विषय पर कड़ा विरोध जताते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता और आस्था पर सीधा प्रहार बताया है। उन्होंने कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक और बहुलतावादी देश है, जहां प्रत्येक नागरिक को अपनी धार्मिक पहचान और परंपराओं का पालन करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। आशु वर्मा ने अपने बयान में कहा कि किसी भी निजी कंपनी को यह अधिकार नहीं है कि वह अपने कर्मचारियों की धार्मिक आस्थाओं और प्रतीकों पर रोक लगाए। सिख समाज के पवित्र प्रतीक हों या हिंदू धर्म के तिलक और कलावा, ये हमारी सनातन परंपरा और पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं। इनका अपमान किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने आगे चेतावनी देते हुए कहा कि यदि कंपनी ने इस निर्णय को तत्काल वापस नहीं लिया, तो व्यापक स्तर पर आंदोलन किया जाएगा। हिंदू, सिख और सनातन संस्कृति की पहचान को अपमानित करने का प्रयास सहन नहीं किया जाएगा। जरूरत पड़ी तो जनआंदोलन के माध्यम से इसका विरोध किया जाएगा ।
इस मुद्दे को लेकर विभिन्न सामाजिक संगठनों ने भी नाराजगी जाहिर की है और कंपनी से अपने दिशा-निर्देशों पर पुनर्विचार करने की मांग की है। लोगों का कहना है कि कार्यस्थल पर अनुशासन जरूरी है, लेकिन धार्मिक स्वतंत्रता के मूल अधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए। स्थानीय स्तर पर इस मामले को लेकर चर्चा तेज है और आने वाले दिनों में इस पर और प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है।

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