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लोकतंत्र के प्रहरी स्व. लक्ष्मी चन्द गुप्ता: आपातकाल के अंधकार में संघर्ष की अमर गाथा

-25 जून 1975 : भारतीय लोकतंत्र का वह काला अध्याय जिसे इतिहास कभी नहीं भूल सकता

Indiknow, रोहतक । 25 जून 1975 की रात भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐसा अध्याय लिख दिया गया, जिसे आज भी देश का प्रत्येक लोकतंत्र प्रेमी पीड़ा और चेतावनी के रूप में याद करता है। आधी रात के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री  इंदिरा गांधी द्वारा संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत देश में आपातकाल लागू किया गया। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की स्वीकृति के साथ लागू हुए इस निर्णय ने देश को 21 महीनों तक ऐसे दौर में पहुंचा दिया, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, नागरिक अधिकार और लोकतांत्रिक संस्थाएं गंभीर संकट में आ गईं।

देशभर में विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और लोकतंत्र की रक्षा के लिए आवाज उठाने वाले हजारों लोगों को मीसा (MISA) के तहत बिना मुकदमे और बिना अपराध जेलों में बंद कर दिया गया। प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई, विरोध के स्वरों को दबा दिया गया और लोकतंत्र की बुनियाद को चुनौती दी गई।

इसी संघर्षपूर्ण कालखंड में हरियाणा की धरती से एक ऐसा नाम उभरा जिसने लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। यह नाम था स्वर्गीय लक्ष्मी चन्द गुप्ता का।

लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्षरत एक योद्धा : 

आपातकाल के समय स्व. लक्ष्मी चन्द गुप्ता भारतीय जनसंघ के हरियाणा प्रदेश महामंत्री थे तथा लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चल रहे लोकतंत्र बचाओ आंदोलन के हरियाणा प्रभारी की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहे थे। वे उन अग्रणी नेताओं में शामिल थे जो लोकतंत्र की रक्षा के लिए खुलकर संघर्ष कर रहे थे।

25 जून 1975 की रात आपातकाल लागू होने के कुछ ही घंटे बाद लगभग दो बजे रोहतक के तत्कालीन थाना प्रभारी चन्दू लाल भारी पुलिस बल के साथ दिल्ली बाईपास रोड स्थित उनके फार्महाउस पर पहुंचे। वहां से लक्ष्मी चन्द गुप्ता को गिरफ्तार कर लिया गया। यह गिरफ्तारी केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं थी, बल्कि लोकतंत्र के लिए उठ रही एक बुलंद आवाज को दबाने का प्रयास था।

21 महीने का कठिन कारावास और असाधारण साहस : 

गिरफ्तारी के बाद लक्ष्मी चन्द गुप्ता ने रोहतक, करनाल, अंबाला, संगरूर, पटियाला तथा नासिक सहित विभिन्न जेलों में लगभग 21 महीने का कठिन कारावास भोगा। जेलों में उन्हें अनेक शारीरिक और मानसिक यातनाओं का सामना करना पड़ा। इस दौरान उनके साथ देश के अनेक प्रमुख नेता भी बंदी थे, जिनमें लालकृष्ण आडवाणी, चंद्रशेखर, चौधरी देवीलाल, बीजू पटनायक, मधु दंडवते, डॉ. मंगल सेन तथा सिकंदर बख्त जैसे राष्ट्रीय नेता शामिल थे।

जेल जीवन की कठिन परिस्थितियों ने उनके स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रभाव डाला और उन्हें अपनी एक किडनी तक गंवानी पड़ी। इसी कालखंड में उन्होंने अपने छोटे भाई प्रेमचन्द को भी खो दिया। परिवार का कपड़े का थोक व्यापार भी बंद हो गया। लेकिन इन तमाम व्यक्तिगत और आर्थिक आघातों के बावजूद उनके संकल्प में कभी कमी नहीं आई। रिहाई के बाद उन्होंने अपने परिवार को पुनः संभालने के लिए वकालत का पेशा अपनाया और जीवनभर समाज एवं राष्ट्रहित के कार्यों में सक्रिय रहे।

जब एक मां ने बचाया संघ कार्यालय : 

आपातकाल के दौरान घटित एक और घटना आज भी रोहतक के सामाजिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। तत्कालीन रक्षा मंत्री चौ बंसीलाल के निर्देशों पर रोहतक स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कार्यालय पर कब्जा करने के लिए सैकड़ों पुलिसकर्मी पहुंचे। पुलिस बल का नेतृत्व तत्कालीन थाना प्रभारी चन्दू लाल कर रहे थे।

उसी समय लक्ष्मी चन्द गुप्ता की पूज्य माता भगवती देवी वहां पहुंचीं। बताया जाता है कि वे अपनी पांच भैंसों के साथ संघ कार्यालय पहुंचीं और उन्होंने पुलिस अधिकारियों का डटकर सामना किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जिस भूमि पर कार्यालय स्थित है वह निजी स्वामित्व वाली भूमि है और किसी भी परिस्थिति में उस पर अवैध कब्जा नहीं होने दिया जाएगा। उनके साहस, दृढ़ता और निर्भीकता के कारण संघ कार्यालय सुरक्षित रह सका। यह घटना केवल एक भवन की रक्षा की कहानी नहीं, बल्कि उस दौर में लोकतांत्रिक मूल्यों और संगठनात्मक स्वतंत्रता की रक्षा का प्रतीक बन गई।

सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया : 

स्व. लक्ष्मी चन्द गुप्ता का पूरा जीवन संघर्ष, राष्ट्रसेवा और सिद्धांतनिष्ठा का पर्याय रहा। उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन में 26 बार जेल यात्राएं कीं, लेकिन कभी भी अपने विचारों और मूल्यों से समझौता नहीं किया। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र केवल संविधान की किताबों में नहीं, बल्कि उन लोगों के साहस और बलिदान से जीवित रहता है जो कठिन परिस्थितियों में भी सत्य और न्याय के पक्ष में खड़े रहते हैं।

लोकतंत्र सेनानियों का ऋण : 

जिस प्रकार स्वतंत्रता सेनानियों ने देश को आजादी दिलाने के लिए संघर्ष किया, उसी प्रकार आपातकाल के लोकतंत्र सेनानियों ने उस आजादी और लोकतांत्रिक व्यवस्था को बचाने के लिए अपना सर्वस्व अर्पित किया। स्व. लक्ष्मी चन्द गुप्ता ऐसे ही लोकतंत्र सेनानियों में अग्रणी स्थान रखते हैं। आज, आपातकाल की 51वीं वर्षगांठ पर जब देश उस दौर को याद कर रहा है, तब स्व. लक्ष्मी चन्द गुप्ता का संघर्ष हमें यह संदेश देता है कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए सतत जागरूकता, साहस और बलिदान आवश्यक हैं। हरियाणा की धरती अपने इस महान सपूत के योगदान को सदैव स्मरण रखेगी। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।

स्व. लक्ष्मी चन्द गुप्ता को शत-शत नमन।

                                                                                                           





                                                                                                                         — विजय लक्ष्मी चन्द गुप्ता


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