Indiknow, झज्जर : एचपीएससी के “सिलेक्शन के बजाय रिजेक्शन” के फार्मूले को माननीय उच्च न्यायालय ने पूर्णतया नकार दिया है। एचपीएससी द्वारा अंग्रेजी विषय के असिस्टेंट प्रोफेसर की भर्ती को उच्च न्यायालय ने गंभीरता से लेते हुए रद्द कर दिया, जिससे हरियाणा के स्कॉलर्स और युवाओं को न्याय मिला है। यह बात कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विक्रम कादयान ने उच्च न्यायालय के फैसले पर खुशी जताते हुए कही।
विक्रम कादयान ने कहा कि एचपीएससी ने भर्ती विज्ञापन की शर्तों का खुलेआम उल्लंघन किया है। यूजीसी की गाइडलाइन के अनुसार 35 प्रतिशत से अधिक बाहरी उम्मीदवारों का चयन नहीं किया जा सकता, लेकिन हरियाणा में भर्ती प्रक्रिया को बाहरी उम्मीदवारों के लिए चारागाह बना दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि हिंदी विषय के असिस्टेंट प्रोफेसर की भर्ती में सामान्य वर्ग की 60 सीटों में से 41 बाहरी उम्मीदवारों का चयन किया गया।
उन्होंने कहा कि साक्षात्कार में बाहरी उम्मीदवारों को थोक के भाव अंक दिए गए, जबकि हरियाणा के योग्य प्रत्याशियों को नीचे रखा गया। इस पूरे मामले पर हरियाणा सरकार को श्वेत पत्र जारी करना चाहिए। उन्होंने मांग की है कि सभी विवादित भर्तियों की न्यायिक जांच करवाई जाए ताकि युवाओं को न्याय मिल सके। विक्रम कादयान ने कहा कि एनटीए द्वारा आयोजित नीट परीक्षा में पेपर लीक के कारण परीक्षा रद्द करनी पड़ी, जिससे लाखों विद्यार्थियों का भविष्य प्रभावित हुआ है। युवाओं का एनटीए जैसी संस्थाओं से भी विश्वास उठता जा रहा है। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार हरियाणा के युवाओं के धैर्य की लगातार परीक्षा ले रही है, लेकिन प्रदेश का युवा अन्याय के खिलाफ मजबूती से खड़ा है।
उन्होंने रोहतक से सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने संसद से लेकर सड़क तक हरियाणा के युवाओं की आवाज बुलंद की। चंडीगढ़ में धरने के दौरान उन्हें पानी की बौछारों और पुलिस बल का सामना भी करना पड़ा। प्रदेश के युवा पिछले कई दिनों से लगातार धरने पर बैठे हुए हैं और अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं। विक्रम कादयान ने कहा कि हरियाणा प्रदेश कांग्रेस और युवा स्कॉलर्स भाजपा सरकार की “बिहारशाही” और युवाओं के साथ हो रहे अन्याय का लगातार विरोध करते रहेंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार हरियाणा को अपना उपनिवेश बनाकर प्रदेश के संसाधनों और अवसरों का दोहन कर रही है।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में प्रोफेसरों की भारी कमी है, जिसके कारण विद्यार्थियों की संख्या लगातार घटती जा रही है। नई शिक्षा नीति भी “नॉन एजुकेशन पॉलिसी” बनकर रह गई है, जिसमें शिक्षा सुधार और उच्च शिक्षा के उत्थान के लिए कोई ठोस दिशा दिखाई नहीं देती।

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